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Guru Ji Maharaj

जाम्भोजी : जीवन एवं परिचय



विश्नोई-पंथ के संस्थापक भगवान जम्भेश्वर जी महाराज १४५१-१५३६ ईद्ध को विष्णु का साक्षात अवतार माना जाता है। वह युग उस भक्ति-आन्दोलन का था जिसे रामानन्द १२६६-१४९१ ईद्ध दक्षिण से ले आए थे और कबीर ने जिसे सप्त दीप नवखंड॔ में प्रकट किया था। इस भक्ति-आन्दोलन ने उन दिनों समस्त पूर्व, पश्चिम, उत्तर और मध्य भारत को अपने पूरे प्रभाव में ले रखा था। ईस्वी सन की दसवीं शताब्दी में जन्म लेने वाली समस्त आधुनिक भारतीय भाषाओं का आदिकालीन साहित्य इसी भक्ति का साहित्य है। सिन्धी, पंजाबी, राजस्थानी, गुजराती, मराठी, उडि़या, बंगला, भोजपुरी, अवधी, ब्रजभाषा, खड़ीबोली आदि सभी का साहित्यिक श्रीगणेश भक्ति-काव्य से ही हुआ है और ध्यान देने योग्य बात है कि प्रत्येक दृष्टि से भक्तिकाल का यह साहित्य सर्वत्र् स्वर्णकाल का साहित्य माना गया है।

आजकल अवतारवाद को स्वीकार करने को कोई तैयार नहीं है। उल्टे इसे लोगों ने कपोल-कल्पना और अन्धविश्वास मान लिया है। पर भक्ति-आन्दोलन के काल में ऎसा नहीं था। शैव, शक्ति, बौ, जैन सभी उन दिनों अवतारों में विश्वास करते थे। वैषणव भक्तों की दृष्टी से अवतारवाद में विश्वास केन्द्रीय महत्व का विषय है। विद्वानों का मत है कि अवतारवाद का विकास वैदिक युग के बाद हुआ। श्रीमदभगवदगीता॔ में अवतार के कारणों का उल्लेख मिलता है। उसके बाद धीरे-धीरे अवतारवाद ने सारे आयार्व्रत के प्रधान विश्वास का रूप धारण कर लिया। पहले अवतार छह माने जाते थे। इसके बाद अवतार दस माने गए। उसके बाद यह संख्या चौबीस तक पहुंच गई। किसी भी धर्मसंस्थापक को हमारे यहां अवतार मान लिया जाता रहा है। भगवान` जम्भेश्वर जी महाराज के विषय में विशेष बात यह है कि इनके भक्त इन्हें श्रीकृष्ण की भांति पूर्ण ब्रह्म मानते हैं। भक्ति-आन्दोलन के दिनों में भगवान` के अवतार में ही नहीं, सन्तों के अवतार में भी विश्वास किया जाने लगा था। इतना ही नहीं, जिस कबीर ने अवतारवाद का विरोध किया, उन्हें भी ज्ञानी जी का अवतार मान लिया गया। भक्ति-आन्दोलन की सबसे बड़ी विशेषता है नर में नारायण का दशर्न। अवतारवाद ने इसमें बड़ी सहायता की है। मध्यकालीन महापुरुषों के जीवनेतिहास के विषय में जो थोड़ी-बहुत सूचनाएँ मिल जाती हैं वे भी इस अवतारवादी परम्परा के ही सहारे, क्योंकि जिन महापुरुषों को अवतार नहीं माना गया उनके जीवनेतिहास सम्बन्धी सूचनाएँ प्रायः दुलर्भ हैं। जाम्भोजी को विष्णु का पूणार्वतार मानने वाले उनके अनुयायी भक्तों में जो धारणा प्रचलित है उनके अनुसार जाम्भोजी का अवतार विक्रमी संवत` १५८ ;१४५१द्ध की भादो वदी अषटमी, सोमवार को कृत्तिका नक्षत्र् में हुआ था। स्मरण रहे कि पूर्ण ब्रह्म के अवतार माने जाने वाले भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भी भादो वदि अषटमी को आधी रात में हुआ था।

जाम्भोजी राजस्थान में जहां अवर्तीण हुए थे वह जोधपुर के पास की नागौर पटटी में पड़ने वाला पीपासर नामक गांव था। जाम्भोजी के पिता श्री लोहट जी वहां के बड़े पशुपालक किसान थे। नागौर से लगभग पैंतालीस-छियालीस किलोमीटर उत्तर में पीपासर गांव स्थित है। भगवान जाम्भोजी की इस अवतारभूमि को बागड़ देश॔ भी कहा जाता है। राव बीका जी द्वारा जीती गई सारी भूमि, पुराना बीकानेर राज्य तथा शेखावटी का समस्त प्रदेश इस बागड़ देश के अन्तर्गत आता था। बागडि़ऎ चौहानों ने इस प्रदेश पर सैंकड़ों वर्षो तक शासन किया था। सम्भवतः इसीलिए इस प्रदेश को बागड़ देश में अवर्तीण होने का बार-बार उल्लेख किया है।

बिश्नोई-पंथ के धर्मग्रन्थों के अनुसार जाम्भोजी के पिता लोहट जी अत्यन्त प्रतिष्ठित पंवार घराने के सुसम्पन्न पशुपालक किसान थे। महलाणा गांव जोधपुरद्ध के बिश्नोई भाटों की बहियों के अनुसार विक्रमादित्य की नौवीं पीढ़ी में राजा भोज और उन्तालीसवीं पीढ़ी में लोहट जी उत्पन्न हुए थे।साधु-परम्परा॔ नामक ग्रन्थ में आदि विष्णु से लेकर जाम्भोजी तथा उनकी शिष्य-परम्परा तक का समग्र विवरण मिलता है। साहब राम जी की प्रकाशित रचना जम्भसागर॔ प्रथम खण्ड, पृ ५"६द्ध में दी गई प्राचीन महात्माओं की वंशावली॔ की सूची भी ऎसी ही है। वैसे बिश्नोई-भाटों की वंशावली और उक्त परम्परा में साम्य नहीं है। इसी प्रकार अन्य विद्वानों ने परमारों की जो वंशावली दी है उनमें भी परस्पर साम्य नहीं है। महलाणा गांव के बिश्नोई-भाटों की बहियों में भी इस परम्परा साम्य के अभाव का उल्लेख है। जाम्भोजी की मां का नाम हँसादेवी प्रचलित है। उनका एक दूसरा नाम केसर भी बताया जाता है। हँसा जी छापर गांव के निवासी श्री मोहकम सिंह जी भाटी की पुत्री थी। जाम्भोजी लोहट-हँसा की इकलौती संतान थे और माता-पिता की अधेड़ अवस्था में पैदा हुए थे। कहते हैं कि बहुत आयु बीत जाने पर भी जब उनके कोई बच्चा नहीं हुआ तो वे इससे बहुत चिन्तित और दुःखी थे। इसी बीच उन्हें जोधा जाट नामक एक व्यक्ति ने निपूता और अपशकुनी होने का ताना दिया। पीडि़त होकर लोहट जी ने इस कलंक से मुक्ति के लिए घोर तपस्या की और अन्न-जल तक ग्रहण करना छोड़ दिया। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर स्वयं भगवान विष्णु ने उन्हें प्रत्यक्ष दशर्न दिए तथा उनकी पत्नी हँसादेवी की कोख से पुत्र्रूप में अवर्तीण होने का आश्वासन दिया।

बिश्नोई-पंथ के प्रसिद्द अनुयायी और विस्तारक-प्रचारक वील्होजी जाम्भोजी के बैकुण्ठवास ;१४१६द्ध के प्रायः अठारह साल बाद १५५४ ई. में पंथ में दीक्षित हुए। उन्होंने बिखरते हुए सम्प्रदाय को सुव्यवस्थित किया और अपनी काव्य-प्रतिभा से साम्प्रदायिक साहित्य को सुसम्पन्न बनाया। विल्होजी ने अपने सुप्रसिद्ध ग्रंथ कथा औतारपात॔ में लिखा है कि एक दिन लोहट जी गउळओं को चराने वन में गए तो वहां एक योगी के रूप में उन्हें अगम पुरूषा ने दर्शन दिया और कहा कि तेरे घर में देव जी॔ अवतार लेंगे। तुम कोई शंका मत करना। उनके 'अचरज॔' आश्चर्यजनक कायोद्ध को देखकर आतंकित मत होना। कथा औतार की॔ नामक कृति में सुरजन जी ने भी ऎसा ही लिखा है। इन दोनों कवियों ने लिखा है कि उक्त योगी ने हँसा को भी घर के दरवाजे पर आकर दशर्न दिए और आसपास की औरतों के सामने हँसा को आशीर्वाद दिया कि तुम्हें पुत्र् होगा जो महान योगी और अवधूत बनेगा।

इन कवियो ने लिखा है कि गर्भ में रहते हुए जाम्भोजी ने मां को कभी हल्का-सा भी दुःख नहीं दिया। वे गर्भ में हिलते-डुलते तक नहीं थे, जिससे मां को बहुत बार लगता था कि जैसे बच्चा निर्जीव हो। प्रसव के समय मां को कोई पीड़ा नहीं हुई थी। जब नींद खुली तो देखा कि बच्चा जन्म ले चुका है। रात बीतने पर प्रातः पंडित को बुलाकर लोहट जी ने बच्चे के विषय में पूछा तो पंचाग देखकर पंडित ने बताया कि बच्चा जिस संवत, तिथि, वार में पैदा हुआ है उससे स्पषट है कि वह कुलतारक होगा। योगी द्वारा लोहट-हँसा को पुत्रेत्पति का आशीर्वाद मिलने का उल्लेख अन्य अनेक कवियों ने भी किया है। जम्भसार॔ ;प्रकरण ४द्ध में साहबराम जी ने लिखा है कि लोहट जी को योगी के दर्शन पीपासर में नहीं, द्रोणपुर के जंगल में उस समय हुआ था जब वे अकाल काटने के लिए अपने पशुओं के साथ वहां गए हुए थे और जोधा जाट द्वारा निपूते और अपशकुनी कहे जाने की मनोव्यथा से पीडि़त होकर जंगल में देहत्याग का संकल्प लेकर गए थे। जहां तक जाम्भोजी की जन्मतिथि और जन्मसंवत का प्रश्न है उस पर सभी लोग एकमत है।

वील्होजी ने भगवान जम्भेश्वर जी महाराज के जीवन इतिहास को तीन चरणों में प्रस्तुत किया है। इसके अनुसार १४८१ से १४८५ ई. तक के सताईस वर्ष पशुचारण और साधना में लगे तथा १४८५ ई. में चौंतीस वर्ष की उम्र में बिश्नोई-सम्प्रदाय का प्रवर्तन करने के बाद से लेकर १५९३ ई. तक के इक्यावन वर्षो के समय को उन्होंने ज्ञानोपदेश में लगाया। संवत १५९३ ;१५३६ ई.द्ध के मार्गशीर्ष मास की कृषणापक्ष की नवमी तिथि को इनका बैकुण्ठवास हुआ माना जाता है।
प्रथम चरण : बाल लीला-काल ;१४५१ से १४५९द्ध :
जाम्भोजी की बाल लीला के सम्बन्ध में पंथ के बहुत-सारे कवियों ने अनेक रचनाएं प्रस्तुत की हैं। इनमें यघपि रचनाओं का अधिक ध्यान उनकी अलौकिक चमत्कार-शक्ति को रेखांकित करने पर ही रहा है तथापित उनसे अनेक महत्वपूर्ण बातों का पता चलता है।

बिश्नोई धर्म और साहित्य को दृढ़तर प्रतिष्ठा देने वाले तथा जाम्भोजी के बैकुण्ठावास के अठारह वर्ष बाद सम्प्रदाय में दीक्षित होने वाले वील्होजी ने लिखा है कि गर्भ में रहते हुए परम गुरू ने मां को जरा भी पीड़ा नहीं दी। वे इतने शान्त रहे कि मां को कई बार सन्देह होता था कि कहीं बच्चा निर्जीव तो नहीं है। जन्म लेने के बाद बच्चा न रोगी दिखता था, न अस्वस्थ। वह प्रत्येक दृष्टी से हष्ट-पुष्ट दिखता था। किन्तु अनेक प्रयत्नों के बावजूद बच्चे ने जन्मघुट्टी नहीं पी। अपने एक सवैया में केसौजी ने भी इस बात का उल्लेख किया है और बताया है कि वे चौकी पर पीठ के बल लेटते भी नहीं थे। इसी प्रकार वे एक बार चौकी पर मां के साथ लेटे हुए थे। हलकी झपकी के बाद मां जगी तो बच्चा गायब था किन्तु जब वहां लोहट जी पहुंचे तो बच्चा वहीं मिला बस उसका सिर पूर्व दिशा की जगह पश्चिम दिशा में हो गया था। जाम्भोजी मां का स्तनपान भी नहीं करते थे। ओझों-पुजारियों के टोने-टोटके के बावजूद उन्होंने मां का दूध नहीं पिया। मां का दूध ही नहीं, कोई भी दूध वे नहीं पीते थे और न ही खाना खाते थे। बोलते भी नहीं थे। लोहट जी इनकी विचित्र्ताओं से बहुत चिन्तित रहते थे और ओझों-तांत्र्किों-हकीमों के पास इन्हें उपचार के लिए ले जाते थे पर किसी भी टोने-टोटके, तंत्र्-मंत्र् का इन पर प्रभाव नहीं होता था। मध्यकाल में और आज भी आस्तिक लोग विश्वास करते हैं कि सिद्ध पुरूष की पलकें नहीं झपकतीं, वे निराहार रह सकते हैं। सुरजन जी ने कथा प्रसि॔द्ध में लिखा है कि जाम्भोजी की पलकें स्थिर थीं, वे धरती से अपनी पीठ नहीं लगने देते थे अर्थात पीठ के बल लेटते नहीं थे, न पानी पीते थे, न खाते थे और न सोते ही थे। सामान्य लोग परमगुरु के इन अलौकिक व्यवहारों का रहस्य नहीं समझ पाते थे कि निराहार रह कर मनुष्य-शरीर स्थिर कैसे रह सकता है :
पलक न फुरकै, पीठिधर उदक न नींद अहार।नर गुरु भेद न जाणंई, नर देही निरहार।।

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